श्री काशी विश्वनाथ मंदिर: काशी के अधीश्वर महादेव को समर्पित सर्व पवित्र शिव तत्व वाला ज्योतिर्लिंग। वर्तमान समाचार

उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में स्थित श्री काशी विश्वनाथ मंदिर देश में स्थित द्वादश ज्योतिर्लिंगों में सातवां ऐसा ज्योतिर्लिंग है, जिसे सबसे पवित्र शिव तत्व (Shiv Metal) वाला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। पवित्र गंगा नदी के पश्चिमी तट पर स्थित  श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के कारण ही वाराणसी को काशी कहा जाता है।

इतिहास:-

पौराणिक मान्यता के अनुसार श्री काशी विश्वनाथ मंदिर को महादेव और मां पार्वती का आदि स्थान माना जाता है। कहते हैं कि विवाह के बाद मां पार्वती को अपने पिता के घर पर रहना अच्छा नहीं लग रहा था अतः उन्होंने महादेव के साथ उनके घर चलने का निवेदन किया। भगवान शिव अपनी प्रिये के आग्रह पर उन्हें काशी लेकर आए और यहाँ विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में स्वयं को स्थापित किया। समय-समय पर श्री काशी  विश्वनाथ मंदिर को विदेशी आक्रमणकारियों के विध्वंस का शिकार होना पड़ा। मसलन 1194 ई0 में मोहम्मद गोरी ने और 1447 ई0 में जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह ने मंदिर को क्षतिग्रस्त करवा दिया। डॉ ए एस भट्ट की पुस्तक “दान हारावली” में यह उल्लेखित है कि 1585 ई0 में राजा टोडरमल ने मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया था। आज भी एशियाटिक लाइब्रेरी कोलकाता में औरंगजेब का वह फरमान मौजूद है जिसमें उसने काशी विश्वनाथ मंदिर को ध्वस्त करने का आदेश दिया था। तत्कालीन लेखक साकी मुस्तइद द्वारा लिखित पुस्तक “मासीदे आलमगिरी” में मंदिर विध्वंस का वर्णन उल्लेखित है।

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वर्तमान स्वरूप:-

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के वर्तमान स्वरूप का श्रेय इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर को है, जिन्होंने 1780 में मंदिर का निर्माण करवाया था। आगे चलकर महाराजा रणजीत सिंह ने 1000 किलोग्राम सोना दान कर मंदिर का निर्माण कराया। भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के अथक प्रयास व दृढ़ संकल्प के परिणाम स्वरूप श्री काशी विश्वनाथ परिसर का विस्तार किया गया जिसके अंतर्गत 8 मार्च 2019 को परिसर का शिलान्यास व 13 दिसंबर 2021 को माननीय मोदी जी द्वारा ही विश्वनाथ कॉरिडोर का लोकार्पण किया गया। इस प्रकार से काशी विश्वनाथ परिसर का निर्माण कार्य लगभग 2 वर्ष 8 माह में संपन्न हुआ। 286 वर्षों बाद नवनिर्मित परिसर का वर्तमान और भव्य रूप अद्भुत और अलौकिक है। श्री काशी विश्वनाथ धाम परिसर का क्षेत्रफल लगभग सवा 5 लाख स्क्वायर फीट है। कॉरिडोर में 23 भवन और 27 मंदिर हैं। चार विशाल द्वारों से युक्त कॉरिडोर में प्रदक्षिणा पथ पर काशी की महिमा का वर्णन करने वाले संगमरमर के 22 शिलालेख लगाए गए हैं। परिसर के माध्यम से श्री काशी विश्वनाथ मंदिर अब सीधे गंगा नदी से जुड़ गया है। अब मणिकर्णिका, ललिता घाट और जलासेन घाट पर स्नान कर भक्त सीधे महादेव के मंदिर में प्रविष्ट हो सकते हैं। ललिता घाट के मार्ग से होते हुए सर्वप्रथम भारत माता के दर्शन होते हैं। इसके उपरांत अहिल्याबाई की मूर्ति स्थापित है। आगे ज्ञान व्यापी में नंदी जी के स्पर्श दर्शन की सुविधा है जो कि पहले संभव नहीं थी। इसके अतिरिक्त परिसर में 3 यात्री सुविधा केंद्र, काशी के कलाकारों के लिए एक सांस्कृतिक केंद्र, योग और ध्यान केंद्र, धार्मिक पुस्तकों के केंद्र के रूप में स्पिरिचुअल बुक सेंटर तथा बाबा की भोगशाला जिसमें एक साथ 150 श्रद्धालु बैठ कर प्रसाद ग्रहण कर सकते हैं, स्थापित की गई है। काशी को मोक्ष की नगरी कहा जाता है अतः एक मुमुक्ष भवन का निर्माण कराया गया है जिससे मात्र 100 कदम की दूरी पर महाश्मशान मणिकर्णिका है। हाईटेक कंट्रोल रूम के साथ पूरा परिसर सीसीटीवी कैमरा युक्त है। आपातकालीन चिकित्सा की सुविधा के साथ ही दिव्यांगों और वृद्धों को दर्शन की विशेष सुविधा है। इसके साथ ही रैंप और एस्कलेटर की सुविधा परिसर में उपलब्ध है।

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बाबा विश्वनाथ दरबार की आरती:-

काशी के अधीश्वर श्री विश्वेश्वर नाथ की पांच प्रकार की आरती होती है, जो प्रातः मंगला आरती से प्रारंभ होती है। मंगला आरती भोर में 2:00 से 3:00 तक होती है ऐसी मान्यता है कि इस आरती के समय यक्ष, गंधर्व, ब्रह्मा, विष्णु सहित सभी देव उपस्थित रहते हैं। महादेव का यह स्वरूप मंगलकारी होता है इसीलिए उनसे मंगला आरती में पूरे ब्रह्मांड की मंगल कामना की जाती है। इसके बाद दोपहर 11:15 से 12:20 तक बाबा की भोग आरती होती है। इस आरती के दौरान बाबा को पंचामृत से स्नान कराया जाता है जिसका आशय सृष्टि के यथोचित फलने फूलने की कामना है। संध्या आरती 7:30 से 8:15 बजे तक, श्रृंगार आरती रात 9:00 बजे से 10:15 के मध्य होती है तथा शयन आरती रात 10:30 से 11:00 बजे तक होती है। बाबा दरबार की मंगला आरती का टिकट ऑनलाइन बुक किया जा सकता है जिसके लिए परिवार या समूह के एक व्यक्ति का पहचान पत्र आवश्यक होता है। विलंब से बचने के लिए 1 दिन पहले ही टिकट बुक करा लेना बेहतर होता है।

श्री काशी विश्वनाथ धाम दर्शन के विविध संसाधन और आयाम:-

बाबा विश्वनाथ धाम में दर्शन के लिए वाराणसी ही नहीं देश के कोने-कोने से श्रद्धालु आते हैं। यहां पहुंचने के लिए सड़क मार्ग, रेल मार्ग और हवाई मार्ग जैसे यातायात के साधन सुगमता से उपलब्ध हैं।

सड़क मार्ग:-

सड़क मार्ग द्वारा निजी बसों से देश के किसी भी राज्य से वाराणसी पहुंचा जा सकता है। यहां पहुंचने पर टैक्सी या ऑटो रिक्शा बुक करके सीधे श्री विश्वनाथ मंदिर जाया जा सकता है।

रेल मार्ग:

देश के लगभग सभी बड़े शहरों के रेलवे स्टेशन वाराणसी कैंट और बनारस स्टेशन से जुड़े हैं। अतः भारत के किसी भी शहर से रेल मार्ग द्वारा सीधे वाराणसी पहुंचा जा सकता है। स्टेशन से बाहर निकलते ही आपको बड़ी सुगमता से श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के लिए ऑटो रिक्शा या टैक्सी मिल जाएगी।

हवाई मार्ग:-

वाराणसी का लाल बहादुर शास्त्री एयरपोर्ट बाबतपुर, मुंबई और दिल्ली जैसे मेट्रो शहरों से जुड़ा है। इस प्रकार देश के दूसरे शहरों से मुंबई और दिल्ली पहुंच कर वहाँ से वाराणसी के लिए फ्लाइट ली जा सकती है। बाबतपुर से श्री काशी विश्वनाथ धाम की दूरी लगभग 20-25 किलोमीटर है। आप वहां से टैक्सी या कैब बुक करके सीधे मंदिर पहुंच सकते हैं।

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वाराणसी में ठहरने की व्यवस्था:-

वाराणसी में देश ही नहीं बल्कि देश के बाहर से भी यात्री बाबा के दर्शन और काशी भ्रमण के लिए आते हैं। अत:यहां पर आपको लगभग हर जगह लॉज, होटल और गेस्ट हाउस अपने बजट के अनुसार सुगमता से मिल जाएंगे जिसे आप पहले से ऑनलाइन भी बुक करा सकते हैं या वहां पहुंचने पर भी बुक कर सकते हैं।

महत्ता:-

हिंदू मान्यता के अनुसार महादेव ने इस ज्योतिर्लिंग को स्वयं के निवास से प्रकाशित किया है। माना जाता है कि सैकड़ों जन्मों के पुण्य के फलस्वरूप ही बाबा विश्वनाथ के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होता है। बाबा विश्वनाथ के दर्शनार्थ आदि शंकराचार्य, संत एकनाथ, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद तथा गोस्वामी तुलसीदास जैसे अनेकों महापुरुषों का काशी आगमन हुआ था। शिव पुराण के अनुसार काशी में विश्वनाथ जी के पूजन अर्चन से मोक्ष प्राप्ति होती है। ऐसी पौराणिक मान्यता है कि काशी में मृत्यु शैय्या पर लेटे हुए व्यक्ति को स्वयं महादेव तारक मंत्र का उपदेश देते हैं जिससे उसे जीवन मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। काशी को महादेव की राजधानी माना जाता है और सदाशिव को काशी का अधीश्वर। इसीलिए इसे अविमुक्त क्षेत्र, गौरीमुख, विराजित, महाश्मशान और आनंदवन जैसे नामों से विभूषित किया गया है। कहा जाता है कि काशीवासी बाबा की छत्रछाया में सदैव निर्भय रहते हैं और मृत्यु के अवसर को भी त्यौहार के उत्साह की तरह आयोजित करते हैं। मणिकर्णिका के महाश्मशान पर चिताभस्म की होली शिव और शव को सर्वदा वंदनीय मानने की काशी वासियों की अवधारणा की पुष्टि है। काशी में शिव और शिवत्व के एकाकार के महत्व को अभिव्यक्त करती निम्न उक्ति सर्वथा उपयुक्त है-

“काशी के कण कण में विराजते हैं शंकर ,

अपने हर गण को भव बंधन से तारते हैं शंकर।”

 Archana Singh

 Varanasi.

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