बनारसी खान पान: खाने पीने के शौकीनों का स्वर्ग है बनारस। वर्तमान समाचार

बनारस की सुबह और बनारसी शाम,

बनारस की लस्सी और बनारसी पान।

गंगा के घाटों पर कुल्हड़ वाली चाय का

बेहतरीन इंतजाम,

काशी की बेफिक्री , महादेव की कृपा का है

परिणाम।

महादेव की अलबेली नगरी जिसे वाराणसी, बनारस और काशी कहते हैं। सब कुछ है पतित पावनी गंगा की धारा पर लहराते मनोहारी घाट, संकट मोचन हनुमान जी, काशी के कोतवाल बाबा काल भैरव, बौद्ध धर्म का प्रामाणिक व अत्यंत प्राचीन विद्या का केंद्र सारनाथ और शिक्षा के केंद्र का सिरमौर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय आदि अनेक ख्यातिब्ध स्थानों की नगरी है काशी। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि वाराणसी पूर्वांचल की आन बान और शान है। बनारस की औघड़ धर्मी संस्कृति का असर ही कहा जा सकता है कि यहां के लोग बड़ा बेफिक्र, अलमस्त और सीधा सादा जीवन जीते हैं। पान की दुकान पर आपको आलू प्याज के दाम से लेकर जी-20 सम्मेलन की चर्चा सुनने को मिल जाएगी। आपस में बातचीत  करते समय स्टेटस सिंबल को ताक पर रख देते हैं बनारसी। का गुरु…! से संबोधन शुरू होकर सब चकाचक…! पर खत्म होता है और इसे ही बनारसी अंदाज या बनारसी भौकाल कहते हैं। बनारसियों के इसी अंदाज-ए मिजाज का प्रभाव उनके खानपान पर भी दिखता है कड़ाके की ठंड में भी कुल्हड़ वाली चाय पीने और चिलचिलाती गर्मी में भी गोदौलिया पर लस्सी पीने निकल जाते हैं बनारसी। इसी संदर्भ को आगे बढ़ाते हुए हम आपको विशुद्ध देसीपरन से लबरेज कुछ विशेष बनारसी व्यंजनों की जानकारी से रूबरू कराने जा रहे हैं-

कचौड़ी, सब्जी और जलेबी:

Kachori Sabji in Varanasi
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सबसे पहले शुरुआत करते हैं कचौड़ी सब्जी और जलेबी से, जी हां! ये बनारसियों का सबसे प्रिय सुबह का नाश्ता है। लक्सा रोड से लेकर गोदौलिया, नई सड़क, चौक हर तरफ दुकान से लेकर ठेले पर, लोग इसका आनंद लेते दिखेंगे। कचौड़ी बनारसियों को इतनी प्रिय है कि ठठेरी बाज़ार की एक गली का नाम ही कचौड़ी गली रख दिया गया है। बनारसी कचौड़ी देश में बनायी जाने वाली अन्य कचौड़ियों से भिन्न होती हैं। यह गेहूं के आखामीरी की पूड़ी होती है जिसे दोहराकर तेल में तला जाता है। कचौड़ी भी छोटी और बड़ी दो प्रकार की होती है। बड़ी कचौड़ी में दाल भरी जाती है और छोटी में मसालेदार आलू। इसे काले चने के साथ परोसा जाता है। कचौड़ी सब्जी का मजा बिना जलेबी के अधूरा रहता है। कचौड़ी के बाद बनारसी कुरकुरी और थोड़ी खटासयुक्त जलेबी का जायका अवश्य लेते हैं।

बनारसी लस्सी:

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अब आते हैं बनारसी लस्सी की तरफ जैसे-जैसे सूरज का पारा चढ़ता जाता है, खाद्य पदार्थों से ज्यादा पेय पदार्थों की मांग बढ़ जाती है। बाजार में नजर उठाइए तो आपको हर तरह की कोल्ड ड्रिंक और सॉफ्ट ड्रिंक से सजी दुकानें मिल जाएंगी पर भैया…बनारसी लस्सी का कोई तोड़ नहीं! पूरी गर्मी के सीजन में रामनगर से लेकर गोदौलिया, चौक, लहुराबीर, मैदागिन फिर लंका से लेकर बीएचयू… हर तरफ बनारसी लस्सी की धाक! गोदौलिया की तरफ नजर डालें तो ठसाठस भीड़ वाले बाजार में लस्सी की दुकानों पर अंदर और बाहर लस्सी पीने वालों का जमावड़ा दिख जाएगा। देसी पर्यटक हो या विदेशी उनकी पहली पसंद लस्सी है। बनारसी लस्सी खालिस देसी चीजों से बनती है। इसे बनाने में दूध, दही, मलाई, रबड़ी और शक्कर का प्रयोग होता है। ऊपर से पिस्ता, बादाम और चेरी इसके स्वाद में इजाफा करते हैं। विशेषज्ञों की माने तो लस्सी अपने आप में बहुत पौष्टिक और ठंडी तासीर वाला शीतल पेय है। इसे बनाने में कोई ताम झाम नहीं है। बस जितना अधिक मथा जाता है, लस्सी उतनी ही स्वादिष्ट होती है। झटपट तैयार बनारसी लस्सी गर्मी से तो राहत देती है, डिहाइड्रेशन से भी बचाती है।

चूड़ा मटर:

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जाड़े के दिनों में बनारसियों का एक और पसंदीदा व्यंजन है, “चूड़ा मटर”। चूड़ा मटर को बनारसियों का सिग्नेचर फूड कहा जाता है। इसकी विशेषता यह होती है कि इसे आप सुबह के नाश्ते में व शाम की चाय के साथ भी खा सकते हैं। इस व्यंजन को  बनाना भी आसान होता है और इसकी सामग्री भी प्रायः घर पर ही उपलब्ध हो जाती है।

बनारसी चाट:

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खाने पीने की बात चले तो बनारसी चाट को कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है। बनारसी घाट पर खड़े हो या बाजार में… गोलगप्पे, टिक्की चाट और टमाटर चाट का आनंद अवश्य लेते हैं। गोदौलिया स्थित दीना चाट भंडार बनारसी चाट का अति प्रसिद्ध और प्राचीन प्रतिष्ठान है। बनारसियों की यह आदत होती है कि वह चिर परिचित व्यंजनों में बनारसी नुस्खा जरूर मिला देते हैं जैसे यहां पापड़ी चाट में पापड़ी की जगह गोलगप्पे का प्रयोग किया जाता है।

लिट्टी चोखा:

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अब आते हैं बिहारी प्रभाव, स्वभाव व पसंद वाले और प्रायः दोपहर के भोजन में खाए जाने वाले लिट्टी चोखा के बनारसी अंदाज पर। गेहूं के आटे के गोले से बाटी बनाई जाती है जिसमें सत्तू अथवा दूसरी दालों का चूर्ण भरकर भट्टी पर फेंका जाता है। इसे बैंगन आलू और टमाटर से बने चोखे के साथ परोसा जाता है। आपको बनारस में बाटी चोखा लोगों की पसंद और स्वभाव अनुसार मिलेगा। बिना प्याज लहसुन का सात्विक बाटी चोखा से लेकर पनीर वाली बाटी का भी आनंद लिया जा सकता है।

बनारसी मिठाई:

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बनारसी बोली की मिठास और देसीपन का खास अंदाज़ यहां की मिठाइयों में भी दिखता है इस क्रम में हम आपको बनारस की कुछ विशेष मिठाइयों से रूबरू करवाएंगे।

मलइयो:

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मलइयो दूध से बना एक ऐसा व्यंजन है जिसका आनंद सर्दी के दिनों में लिया जाता है और जिस पर काशी का एकाधिकार है। जायकेदार मलइयो की शुरुआत वाराणसी में पक्के महाल के चौखंभा गोपाल मंदिर से हुई। आपको चौक, गोदौलिया, अस्सी, लंका… हर तरफ मलइयो की दुकानें सजी दिखेंगी। इसे बनाने में ओस की बूंदों का प्रयोग किया जाता है। इसी कारण जैसे-जैसे ठंड बढ़ती जाती है मलइयो का जायका भी बढ़ता जाता है। दूध को उबालकर खुले आसमान के नीचे रात भर रखा जाता है ताकि ओस की बूंदे पड़ सकें। सुबह होते ही दूध को मथा जाता है मथने के बाद निकलने वाले झाग में चीनी, मेवा, केसर, पिस्ता व इलायची मिलाकर मलइयो तैयार किया जाता है। ओस की बूंदों के कारण ही मलइयो में घंटों झाग बना रहता है। विदेशी मेहमान ठंड में बहुत चाव से मलइयो का आनंद लेते हैं।

राजभोग:

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बनारस बंगालियों का घर रहा है अतः यहां पर छेने व छेने से बनी बहुत लजीज व जायकेदार मिठाइयों का स्वाद लिया जा सकता है। यहां छेने से बनी राजभोग एक ऐसी मिठाई है जो खोया, केसर और इलायची की स्टफिंग के साथ चाशनी में डूबी होती है। यहां आपको बनारसी खीर कदम में कोलकोता का बंगाली स्वाद मिल जाएगा।

राम भंडार का पेड़ा:

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ठठेरी बाजार की पुरानी और चर्चित दुकान राम भंडार जहां का पेड़ा और गुझिया के आकार की मिश्री के छोटे टुकड़ों से भरी हुई खोया से निर्मित मिठाई कहीं और देखने को नहीं मिलेगी।

मलाई गिलोरी:

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बनारस की सर्वप्रिय व सबसे लजीज मिठाई मलाई गिलोरी है। पान गिलोरी जैसा आकार होने के कारण इस मिठाई के नामकरण में गिलोरी जोड़ दिया गया है। इसे बनाने में ताजे दूध की मलाई, चीनी, खोया और सूखे मेवों का प्रयोग किया जाता है।

लवंगलता:

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लवंगलता बनारस का एक सुगंधित मीठा पकवान है जो काशी की लगभग हर चाय पान की दुकान पर उपलब्ध रहता है। मैदे के आटे की लोई की पूड़िया बेलकर खोया, पिस्ता, बादाम, खसखस, इलायची पाउडर, चीनी आदि की स्टाफिंग करके एक लौंग से सील कर दिया जाता है फिर धीमी आंच में लाल होने तक फ्राई करते हैं। अंत में चीनी की चाशनी बनाकर उसमें डुबोया जाता है। सिगरा पर मधुर मिलन, लंका पर पहलवान की दुकान, तथा बांसफाटक(चौक) पर श्री राम भंडार आदि वाराणसी के चर्चित प्रतिष्ठान हैं जहां की लवंगलता का स्वाद हर कोई लेना चाहता है।

बनारसी पान:

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अब बात करते हैं बनारसी आन बान और शान के प्रतीक की… जी हां! बिल्कुल ठीक समझा आपने हम बनारसी पान की बात कर रहे हैं। बनारसी भोकाल और बेबाकी में पान की बड़ी भूमिका है। बनारस में सबसे ज्यादा खपत जगन्नाथी, चंद्रकला, मगही और देसी पान की होती है। पान व्यवसायी कच्चे पान को पकाकर बनारसी रंग भरते हैं। बनारसी पान के पत्ते भी भिन्न-भिन्न वैरायटी वाले होते हैं। इन पर लगाया जाने वाला विशेष प्रकार का कत्था और मसाला भी बनारसी पान को खास बनाता है। अगर चूने व तंबाकू के पान को छोड़कर बनारसी मीठे पान की बात करें तो भी एक बार खाने वाला इसके स्वाद को ताउम्र याद रखेगा। कुल मिलाकर बनारसी पान का स्वाद और उसे पेश करने का अंदाज दोनों ही लाजवाब होता है।

तो दोस्तों ये थी बनारस के जायके की छोटी सी यात्रा….उम्मीद है आप सबको अवश्य पसंद आएगी।

Archana Singh

Varanasi

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